कर्म-शील..
नव-कुसुमित अभिलाषाओं से,
शील दे शील को सीखा गया,
दक्षता, त्याग, निर्भिकता से,
शील सहनशीलता दिखा गया।
जन-सेवा भाव से भूषित हो,
आरक्षी-मंडली पुलकित है,
शीतल-छाया बिना कछु शील के,
आरक्षी-बल अब मुर्छित है।
शील दुअत शीला भई नारी,
शील वही समशील जहाँ है।
शील भई भानु कुल भानु,
सो समशील कल्प-बेली वहाँ है।
शील नयन, नयन बिनु शील,
वह शील नहीं, शीला तो कहाँ है?
शील यही कर्म-शील यही,
शील खोवत नयन, नयन-वारी जहाँ है।
यह शील नहीं जो विक्रम-शील,
यह शील नहीं जो वज्र-शील,
यह शील नहीं जो शीला-शील,
यह शील मात्र है, "कर्म-शील"।
- एस.सी. घोष
पुलिस अॉ फिस दरभंगा



Comments
Post a Comment