विवशता में..



प्राणेश्वर के प्रेम में, वशिभूत जो अब मैं होती हूँ।
झूमें भले चकोर देख अब, वो चाँद नहीं मैं पाती हूँ।।

मधुमास बसंती आंगन में, हर्षित मुखरे पे इतराती।
मधुर मिलन की रात चाँदनी, बातों से न सुस्ताती।।

गलबाहीं भी कर लेती, है बसंती जब मुझमें आती।
प्रिय प्राणेश्वर गर कहीं रहे, तो प्राण न्योछावर कर जाती।।

शान्ति नहीं मिलती जब, जाती शयन की कारा में।
जीवन स्वयं बना बन्दी पर, आँखें लगी थी ध्रुवतारा में।।

प्राणेश्वर के अनुमान अनूठे, मन के फूल बिछा देती।
रात चाँदनी और दिखा, मेरे मन को चाहे ललचाती।।

मुझे दिखाना चाहता सागर, देख चूके अरमानों का।
दीप जलाना चाहता चरणों पर, आकुलता के प्राणों का।।

जब आये मेरे प्रिय प्राण प्राणेश्वर, कहती मैं व्यथा कहानी।
विवशता में पड़ी रही, भ्रम में रहकर अज्ञानी।।

देश गमन को गये छोड़ कर, बिनु अनुमति इस बसंत में।
रह न सकी न दिल बहलाया, इस विरह उत्पीड़न में।।

पलकों पर नीलगगन बसा, पर कब होता है पूरा सपना।
चंद दिनों का जीवन फिर भी, विवशता वश जीना अपना।।

- एस. सी. घोष
 १८-०८-१९५७
 पुलिस अॉफिस दरभंगा


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