चलो चलो "चितकोढा" बाजार..
आई मीनी दौड़ पड़ी, नर-नारियों की सुन्दर कतार।
कंडक्टर और खलासी पुकारे, चलो चलो "चितकोढा" बाजार।।
युवक दौड़ दौड़ सीट छेकते, युवती करती रहती इंतज़ार।
पड़ी भीड़ के बीचोबीच, दिलफेंक करते रहते गुलजार।।
चित्त को चुराया, चिंता को बढाया, "चेतक" आगे आगे सवार।
कंडक्टर और खलासी पुकारे, चलो चलो "चितकोढा" बाजार।।
फँस गयी नई-नवेली ठस्सम ठस भीड़ों के बीच,
मिली जुली सी खड़ी कतार।
चलती मीनी जब हिचकोले देती, जग जाता "कोहनी" से प्यार।।
कोहनी की कहानी सुनो, कोहनी-कनचुकी की संचार।
कातर वचन से "कर" कहता, कितना अब मैं करुं इंतज़ार।।
रंग रंग की नर-नारियां, रंग रंग उनका व्यवहार।
जिस रंग में जो रंग जाते, पाते प्रेम मगन संसार।।
चलो चलो अब चितकोढा बाजार..
- एस.सी. घोष
पुलिस अॉ फिस दरभंगा १९५६-५७


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