कुरुप कुब्जा का मान..
कितना कुरुप- घिनौना है इसका रुप
विभत्स इसका चेहरा अंग अंग दुर्गन्ध युक्त
कहीं फोड़े कहीं फुंसियाँ मानों चकत्ते और गट्ठियाँ
धमनियाँ-- जैसे गंदे परनाले महकते
त्वचा पर ऊबड़ खाबड़ महाकाल के पदचिह्न
षोड़शीवाला, जवानी में भली लगती गधी भी
श्रृंगार में रति को भी मात करती हुई
अपने पराय फैलाये बैठी हुई
कहीं दे रही भोजन, कहीं वस्त्र
कहीं आवश्यक उपयोगी सामान
कहीं मजूरों को देती काम
कहीं व्यापारियों को देती स्थान
कहीं शोहदे इकट्ठे जनकल्याण करने
कहीं शरीफ पोश बैठे 'मोरेल' ऊँचा करने
जिधर देखो-- भाग दौड़ मची हुई है
पैसे के पीछे होड़ मची हुई है
कहीं लूट होती रात अन्धेरी में
कहीं सूरज की रोशनी में
यहाँ विद्यापति गाते गोपी कृष्ण का गान
लक्ष्मीवाहन का ही होता है मान
मदारी नाचते बंदर के इशारे पर
मजा आता काले साहब के नखरे पर
नाम है कुब्जा सुन्दरी--
अति आधुनिका, आधुनिक उपकरणों को ले
"श्री कृष्ण" को रिझाने
सज रही, बन रही, ठन रही
अपने विभत्स रुप लेकर
चमकीले बनावटी वस्त्र पहनकर
क्या प्यार दे सकेगा कोई
"गौरव" क्षीण नहीं हो जाएगा क्या?
जीवन भर--
उपेक्षित, प्रताड़ित, वंचित बेचारी
अपने पराय से पड़ोस का घर भरनेवाली
धन देकर शिक्षा कला कौशल बढानेवाली
जीवन तो परमार्थ में ही है
जीवन यथार्थ इसी में है, ऐसा ही सुना पड़ोस से
पर अपनी गोद में पलनेवाले
हजारों बच्चे पल रहे कीड़े मकोड़े जैसे
गंदी नालियों में लिपटे शिक्षा समृद्धि के अभाव में
बिलखते, बिछुड़ते, छटपटाते
आज बाँहें फैलाकर, दामन बिछाकर
मांग रही अपने "श्री कृष्ण" से
रुप या सौन्दर्य नहीं
"श्री" चाहिये गौरव चाहिये इसे
मांग सिंदूर का ही तो नारी का यथार्थ गौरव होता है
अपनी गृहस्थी चाहिये इसे
पत्नी होने का सौभाग्य चाहिये
संतान के लिए परिचय चाहिये
क्या अलग संसार नहीं मिल सकता?
बच्चे जहाँ इसके खेलें, फूले फरे, बढें
मिलेगा क्या दान, बिहार गौरव से?
- एस. सी. घोष (संकलित)
पुलिस आफिस पूर्णियाँ १९६४



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