पूज्य! ऐसा दीप जलाओ..
पूज्य, ऐसा दीप जलाओ.. अन्तस्थल के आंगन में,
जिसकी अमर पूँजी ज्योति से, जगमग-जगमग हो जीवन में।
सल्प तेल समाज का दीया, त्याग तपस्या का लौ हो,
शान्ति धैर्य की दीप्त रश्मि से, जीवन ज्योतिर्मय हो।
आगे कदम बढाने में, साहस का पाँव न पिछड़े,
चाहे ओला बन आफत बरसे, या आसमान क्यों न बिगड़े।
मुसीबत में मुस्काना, आफत में भी आगे बढना,
कर्तव्य वेदी पर जीवन की, बलि खुशी से देते जाना।
हम सब को गौरव है, सबसे ऊँचे होने का,
मन में क्यों न ज्योति जले, हमें स्वाभिमान से जीने का!
हर तरफ श्रृंगार सजा है, दूसरी ओर हैं भिखमंगे,
एक तरफ मखमल की गद्दी, दूसरी ओर खड़े हैं नंगे।
सब मिल ऐसा दीप जलायें, दु:ख सबके अब जल जायें,
सुख की दीपावली हो घर-घर, सबका हृदय प्रफुल्लित पावें।
- एस. सी. घोष (संकलित)
पुलिस आफिस पूर्णियाँ १९६३



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