कैसे कर मैं खेलूं होली..
सुन्दर सी मन कैसे डोली, मन चाहता है अब खेलें होली।
फटी पुरानी मेरी चोली, कैसे कर मैं खेलूं होली।।
तन पर मेरे कोई वस्त्र नहीं, हाथों में है कुछ अर्थ नहीं।
खाली पड़ी है मेरी झोली, कैसे कर मैं खेलूं होली।।
कोई इस नगर की महल बता, सुनलो मेरी करुण कथा।
दबी पड़ी है मेरी बोली, कैसे कर मैं खेलूं होली।।
कृष्ण कृष्ण की बात सुनी है, अब कृष्णों में आवाज नहीं है।
भूखों की हड़ताल है बोली, कैसे कर मैं खेलूं होली।।
दौड़ो दौड़ो हे देव हमारे, भूखों पर हैं प्राण तुम्हारे।
कमर अधगजी डार में डोरी, कैसे कर मैं खेलूं होली।।
बड़े बड़े रंग डाल लिये हैं, हाथों में सब साज लिये हैं।
मेरे पेट में भूख की बोली, कैसे कर मैं खेलूं होली।।
- एस.सी. घोष
पुलिस अॉफिस दरभंगा





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