आज बिछुड़न की घड़ी में..
आज बिछुड़न की घड़ी में-
हृदय धड़कन बढ रही है, वेदना कुछ हो रही है,
कुछ कसक, कुछ टीस अंदर, हुक रह रहकर उठ रही है।
शुष्कता, पर मूकता क्यों? दिखते हम अनमने क्यों?
छर रही यों क्यों उदासी? नेत्र आँसू से सने क्यों?
हो रही कैसी विकलता? आज क्यों बढती व्यथा है।
भरे उर से भरी आँखें, कह रही कैसी कथा है?
एक दिन हम साथ थे, घूमते फिरते वन उपवन में,
साथ चलने का इरादा, कर लिया था अपने मन में।
बोलते हँसते सभी थे, क्लान्ति तन-मन की मिटाने-
एक पथ के हम पथिक किस ओर बढते साथ जानें।
साथ-साथ हम डगर-डगर पर, साधना विश्वास साथ लेकर।
चल रहे थे विघ्न बाधा, को हटाते मार ठोकर।
किंतु यह काली घटा क्यों? आ गई नभ में कहाँ से!
भूले हम सब को जा रहे हों, अब कहाँ कैसे यहाँ से।
मधुर परिचय छोड़ अपना, अमिट उर पर छाप देकर,
छोड़ निज मधुमय कहानी, मधुर स्मृति को साथ देकर।
कुछ विकल हैं, कुछ व्यथित हैं, कुछ न कुछ फरियाद लेकर,
बिलग होते आज हम सब, एक सफर की याद लेकर।
कौन जानें कब मिलें फिर, हो सके फिर नहीं मिलें यहाँ,
नभ-कुसुम राही हमारे, खिल सको तुम अवश्य वहाँ।
मार्ग गिरि की काव्यों से, फिसल कर गिर जाऐ कोई,
क्या पता कब इष्ट पथ तब, अन्य पथ पर जाय कोई?
अस्तु यह छायी उदासी, अश्रु पूरित है विलोचन,
वेदना है मूक उर में, शिथिल है तन विकल है मन।
अलविदा! अब विदा हो, सामने दुनियां प्रशस्त पड़ी है,
बढ रही उस पीर से उफ! आज बिछुड़न की घड़ी है..
आज बिछुड़न की घड़ी है।
- एस.सी.घोष
पुलिस अॉफिस भागलपुर, १९५१



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