मंगला-हाट


सिंहभूम बाजार यहाँ, तरह तरह के काज यहाँ।
हजारों सब के सब मिलकर, आते करने मंगला-हाट यहाँ।।

शोभा देती आदिवासियाँ, लेकर आती मन खुशियाँँ।
झुंड-झुंड वो दल-दल में, फूलें दे दे माथे गुथियाँ।।

कोई माथे पर घड़ा लिये, चलती मद-यौवन कड़ा किये।
तुरही मधुर ध्वनि बीच बीच, अत्यंत स्वभाव शर्मिला किये।।

लड़के जाते लड़की आती, सुन्दर देखत मन सहलोये।
चोरी-चोरी न रोक छोक, कोई गाछो तर मन बहलाऐ।।

हड़िया पीते लड़के लड़कियाँ, नजरें मिलाती साथ साथियाँ।
तिरछी आँखें बीच-बीच, मन गुदगुदाऐ देत सखियाँ।।

प्रेमियों के हैं जोड़ निकलते, प्रेमालय के सुन्दर स्थान।
सुखद सामिष्य के दो तीन घंटे, करते "मंगल" रोज आह्वान।।

हरे रंग में सुन्दर साड़ी, वेणियों में जूही घुसियायी।
लटकी रहती पीठों ही तक, चाल अजीब मस्ती में लायी।।

मंत्र-मुग्ध कर देती उसको, जाते जो हैं देखन उसको।
हिचकोले लग जाते उससे, तरुण दर्शन से ही सबको।।

हजारों घूमनें जाते वहाँ, तरुणी से ही हैं चिपकाते।
मंद-मंद मुस्कुरा मुस्कुराकर, प्रेमी से प्रेमिका नेह लगाते।।

दोनों मिल प्रेम-रस उड़ेलते, दो जवानियाँ आपस में खेलते।
बदन में फुर्ती भर-भरकर, समुद्र-हिलोरे दिल-खुशी लगाते।।

हँसने की आवाज वहाँ, नयी नवेली रहती है जहाँ।
तरुण से तरुणी पीछा करते, ले जाते एकांत जहाँ।।

मधुर सरस जिन्दगी उसी की, रस-भींगी रातें सभी उसी की।
डिब्बा-डिब्बी सभी उसी की, माथे बिंदिया टीका उसी की।।

सिंहभूम बाजार यहाँ, बहती पवित्र बाजार यहाँ।
हजारों सब के सब मिलकर आते, करने "मंगला-हाट" यहाँ।।


- एस. सी. घोष
   १२-१२-१९५६
 पुलिस अॉफिस, चाईबासा
  बिहार/झारखण्ड

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